बल्ब हटाओ, बिजली बचाओ
संसार में 20 प्रतिशत बिजली केवल रौशनी पर ख़र्च होती है. इस रौशनी वाले बल्ब 19 वीं सदी की खोज हैं. वे केवल पाँच प्रतिशत बिजली को प्रकाश में बदल पाते हैं. अतः उनकी जगह अब बिजली बचाने वाली नये प्रकार की बत्तियां ले रही हैं.
नयी बत्तियों की बचतकारी क्षमता बहुत बड़ी है. यदि दुनिया भर के सभी पुराने बल्बों को हटा कर उनकी जगह बिजली बचाने वाली नयी बत्तियां लगायी जा सकें, तो रौशनी पैदा करने में लगने वाली 40 प्रतिशत बिजली बचायी जा सकती है. यही नहीं, केवल इसी एक तरीके से, 2030 तक, कार्बन डाइऑक्सड के उत्सर्जन में 16 अरब टन की कमी लायी जा सकती है, जो अमेरिका में उसके वार्षिक उत्सर्जन के दुगुने के बराबर है.
प्रख्यात वर्ल्डवॉच इंस्टीट्यूट द्वारा एक अध्ययन में जुटाये गये ये आंकड़े बहुत ही उत्साहवर्धक हैं. बिजली बचाने वाली नयी बत्तियों का इस्तेमाल इस बीच इस तेज़ी से बढ़ भी रहा है कि एक ही दशक में उनकी बिक्री तिगुनी हो कर 4 अरब वार्षिक हो गयी है.
ऑस्ट्रेलिया ने तो यहां तक तय किया है कि अक्टूबर 2009 के बाद अब तक के प्रचलित बल्बों की बिक्री पर वहां रोक लग जायेगी. यूरोपीय संघ के देशों में भी सितंबर 2009 से 100 वाट के बल्ब की बिक्री पर रोक लगा देने और 2012 तक सभी प्रकार के पुराने बल्बों को बाज़ार से हटा लेने की योजना है. क्यूबा में उन पर कब की रोक लग चुकी है. अगले वर्ष न्यूज़ीलैंड में और 2012 तक कैनडा में भी उन पर रोक लग जायेगी.
कसी-बंधी ट्यूबलाइट
बल्ब की जगह बिजली बचतकारी सीएफ़एल बत्ती बल्ब की जगह बिजली बचतकारी
सीएफ़एल बत्ती
तकनीकी दृष्टि से देखा जाये तो, बिजली की बचतकारी आधुनिक बत्तियां मुड़ी हुई या ऐंठनदार ट्यूबलाइट के सिवाय और कुछ नहीं हैं. अंग्रेज़ी में उन्हें Compact Fluorescent Light (कॉम्पैक्ट फ्लूरसेंट लाइट) या संक्षेप में केवल CFL कहा जाता है. 1879 में टॉमस अल्वा एडिसन द्वारा पटेंट कराए गये साधारण बल्ब की कार्यकुशलता केवल पाँच प्रतिशत है, जबकि बिजली बचाने वाली इन नयी बत्तियों की कार्यकुशलता 25 प्रतिशत है, यानी साधारण बल्ब की अपेक्षा वे बिजली का पांच गुना बेहतर उपयोग करती हैं. निर्मताओं का यह भी कहना है कि क्योंकि बिजली बचतकारी सीएलएफ़ बत्ती का जीवनकाल, साधारण बल्ब की अपेक्षा, कई गुना लंब होता है, इसलिए 10 साल के इस्तेमाल में हर बत्ती के पीछे 100 यूरो, यानी करीब छह हज़ार रूपयों की बचत होगी.
ऊँची दूकान, फ़ीके पकवान
तब भी, इन मुड़ी हुई या कसी-बंधी ट्यूबलाइटों वाली बत्तियों का भविष्य उतना उजला नहीं माना जाता, जितना आज लगता है. जर्मन पत्रिका Oekotest ने इस तरह की बत्तियों के 16 मॉडलों को कसौटी पर कसा और पाया कि बात ऊँची दूकान, फ़ीके पकवान जैसी है. अधिकतर बत्तियां उतनी चमकदार नहीं थीं, जितना पैकिंग पर लिखा था. उनका प्रकाश भी उतना अच्छा नहीं था, जैसा होना चाहिये. वे जुगजुगाती हैं और उनका जीवनकाल भी प्रायः उतना लंबा नहीं होता, जितना पैकिंग पर लिखा होता है. सबसे बड़ी कमी यह है कि उनमें पारा होता है, जो स्वास्थ्य के लिए बहुत ख़तरनाक है. इसलिए, ख़राब हो गयी बत्तियों को सामान्य घरेलू कचरे से अलग, विशेष ढंग से निपटाना होगा.
सीएफ़एल की जगह एलईडी बत्तियाँ
बत्ती निर्मता और शोधकर्ता इस समय और भी बेहतर विकल्पों की तलाश में हैं. संक्षेप में LED यानी Light Emitting प्रकाश उत्सर्जी डायोड वाली LED बत्ती प्रकाश उत्सर्जी डायोड वाली LED बत्तीDiode कहालाने वाले प्रकाश उत्सर्जी डायोड एक ऐसा ही विकल्प हो सकते हैं. अमेरिका में सैंटा बार्बरा विश्वविद्यालय के भौतिकशास्त्री शूजी नाकामूरा का कहना है कि LED वाली बत्तियां इस समय की बिजली बचतकारी बत्तियों की अपेक्षा दुगुनी कार्यकुशल हैं:
"प्रकाश उत्सर्जक डायोड की ऊर्जा-कार्यकुशलता बहुत ऊंची है--क़रीब 50 प्रतिशत. इसका मतलब है कि यह डायोड इस्तेमाल हुई बिजली की आधी मात्रा को प्रकाश में बदल देता है. LED बत्तियों की सहायता से हम कहीं ज़्यादा बिजली बचा सकते हैं."
एलईडी इलेक्ट्रॉनिक चिप है
प्रकाश उत्सर्जी डायोड अपने आप में एक छोटा-सा इलेक्ट्रॉनिक चिप है. चिप में से बिजली गुज़रते ही उसके इलेक्ट्रॉन पहले तो आवेशित हो जाते हैं और फिर, लगभग तुरंत ही, अपने आवेश वाली ऊर्जा को प्रकाश के रूप में उत्सर्जित कर देते हैं. इस तरह वे विद्युत ऊर्जा को प्रकाश ऊर्जा में बदलते हैं. स्टीरियो सिस्टम में हम जो छोटी-छोटी लाल-पीली़-हरी बत्तियां टिमटिमाते देखते हैं, वे प्रकाश उत्सर्जक डॉयोड ही हैं. शूजी नाकामूरा ने ही 1990 वाले दशक में सफ़ेद रोशनी देने वाले LED चिप LED चिपप्रकाश उत्सर्जी डायोड के निर्माण की आधारशिला रखी. यही डायोड अब घरों और सड़कों को भी जगमग करेगाः
"प्रकाश उत्सर्जी डायोड लगभग अमर होते हैं, क़रीब एक लाख घंटे का उनका जीवनकाल होता है. एक साधारण बल्ब औसतन केवल एक हज़ार घंटे तक ही चल पाता है. लाइट डायोड उतने गरम भी नहीं होते, जितना एक बल्ब गरम हो जाता है. उनमें कोई पारा या कोई दूसरी विषैली चीज़ भी नहीं होती."
इधर कुछ वर्षों से बाज़ार में प्रकाश उत्सर्जी डायोड वाली LED हाथबत्तियां और साइकल की बत्तियां भी मिल रही हैं. लेकिन, ब्रेमेन के भौतिक वैज्ञानिक डेटलेफ़ होमल का कहना है कि वे अभी इतना तेज प्रकाश नहीं दे पातीं कि कारों या घरों में भी इस्तेमाल हो सकें:
"LED से कारों की हेडलाइट बनाने के लिए आख़िरी सीमा तक जाना पड़ेगा. यहाँ भौतिक विज्ञान की अभी कई चुनौतियाँ हमारे सामने हैं."
प्लास्टिक करेगा घरों को जगमग
प्रकाश उत्सर्जी डायोड वाली LED बत्तियाँ अभी बहुत मंहगी भी हैं. व्यापक इस्तेमाल लायक बनने के लिए उन्हें सस्ता होना पड़ेगा. इस बीच उनका भी एक विकल्प प्रयोगशालाओं में तैयार हो रहा है-- ऐसे प्रकाश उत्सर्जी प्लास्टिक अणु, जिन्हें Organic Light Emitting Diodes --OLED या केवल ओलेड भी कहते हैं. उनकी सहायता से बिल्कुल नये प्रकार की बत्तियाँ और लैंप बनाये जा प्लास्टिक का बना प्रकाश उत्सर्जी डायोड OLED प्लास्टिक का बना प्रकाश उत्सर्जी डायोड OLEDसकते हैं, जैसाकि कार्ल्सरूहे विश्वविद्यालय के भौतिक वैज्ञानिक ऊली लेमर बताते हैं:
"उनसे काफ़ी लंबे-चौड़े और मनचाहे आकार वाले ऐसे प्रकाश-स्रोत बन सकते हैं, जिन्हें घर की बनावट के साथ एकाकार किया जासके. उदाहरण के लिए, वे पूरी दीवार या पूरी छत तक फैले हो सकते हैं."
लेकिन, इस जगमगाहट के आने में अभी समय है हालाँकि ओलेड स्क्रीन वाले टेलीविज़न सेट बाज़ार में आ गये हैं:
"एक सबसे बड़ा सवाल है कि ओलेड वाले प्रकाश-स्रोत कितनी कम बिजली खा कर कितना अधिक प्रकाश देंगे और कितने टिकाऊ होंगे. उनका उत्पादन इतना सरल नहीं है कि उन्हें सस्ता कहा जा सके. उनका मुकाबला टॉमस एडीसन के उस बल्ब से है, जिसे एक सदी से अधिक समय से परिष्कृत और परिमार्जित किया जाता रहा है और जिसे अरबों की संख्या में बेहद सस्ते दाम पर बनाया जा सकता है."
दूसरे शब्दों में, जगमग करते प्लास्टिक वाली बत्तियां बाज़ार में आने में अभी एक-आध दशक लग जायेंगे.
